जो हुआ अच्छा ही हुआ!आओ “नए” का स्वागत करें!

जो इतिहास में कभी नहीं हुआ क्या वो कभी नहीं होना चाहिए? अगर आपका उत्तर हां है तो आज तक जो भी नए अविष्कार हुए हैं वे कभी नहीं होते! क्या किसी अंधेरे कौने पर टॉर्च की रोशनी महज़ इस डर से नहीं डाली जानी चाहिए कि वहां गंदगी के दर्शन होने की संभावना है? “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” तो संविधानप्रदत्त मूल अधिकार है, जो किसी भी नियम/उपनियम से ऊपर है, इसमें कोई दोराय नहीं हो सकती।

इतिहास गवाह है कि जब भी कुछ नया या अप्रतिम हुआ है तो रूढ़िवादियों ने उसकी मुख़ालफ़त ही की है, हाहाकार ही किया है मगर अफ़सोस कि उससे वो होने वाला “नया” कभी रुका नहीं है। यथास्थितिवादी लोग कभी नहीं चाहते कि जिस व्यवस्था से वे आज तक सुविधा में हैं उसमें लेशमात्र भी बदलाव की कोई बात भी करे।

सिर्फ “इज्जत न कम हो जाये” के डर से ही बुराइयों को हमेशा हमेशा के लिए लाल कालीन के नीचे छुपाकर “सब अच्छा है” के मुग़ालते में तो नहीं रहा जा सकता है। किसी रोगी से उसका रोग उसकी मृत्यु पर्यन्त छुपाये रखने से रोग पर पार तो नहीं पाया जा सकता।

मैं व्यक्तिगत रूप से गैर परंपरावादी रहा हूं और मेरा विनम्र मत है कि समय, स्थान और आवश्यकता के अनुसार बदलाव शाश्वत रूप से जरुरी होता है नई तकनीक को अपनाने में कोई हर्ज नहीं..बंद कमरे में सड़ांध से बचने के लिए ही तो खिड़कियां, दरवाजे और रोशनदान बनाये जाते हैं। फिर झूठा दंभ, अभिमान और तानाशाही तो रावण की भी नहीं टिकी बाकि की तो बिसात ही क्या? महान वचन है कि, “जो हुआ अच्छा हुआ और आगे भी अच्छा ही होगा।”

नोट:- मैं अपने इन विचारों को किसी घटना विशेष का सन्दर्भ जानबूझकर नहीं दे रहा हूं ताकि पाठकों के समझने का दायरा संकुचित न हो जाये और वे इसका सन्दर्भ अपने अपने हिसाब से लगा सकें।

:राजेश के. भारद्वाज
पत्रकारिता एंव जनसंचार स्नातक, संस्थापक संपादक “वोटर”, एडवोकेट, राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर
(13.1.18)

Published by

Rajesh K Bhardwaj

advocate Rajasthan High Court / Supreme Court. Founder editor newspaper named Voter. interested in system revolution. Savambu writer, poet....

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