अधिवक्ता दिवस पर मेरे मुझसे कुछ सवाल!

हाइकोर्ट्स, सुप्रीम कोर्ट के टॉप क्लास के पांच सात प्रतिशत अधिवक्ताओं को बतौर अपवाद छोड़ दें तो एक व्यवसाय के रूप में वक़ालत का व्यवसाय आज एक अजीब से मोड़ पर खड़ा प्रतीत होता है, जिसके विषय में शायद कोई सोच भी नहीं रहा है और किसी को परवाह भी नहीं है। मित्रो! क्या वजह है कि जब किसी गांव-कस्बे का कोई नया विधि स्नातक पहली बार काला कोट पहनकर किसी न्यायालय की देहरी पर कदम रखता है तो ऐसा न करने के लिए वह “समझदारों” द्वारा कई बार टोका और सचेत किया जा चुका होता है, उससे कहा जा चुका होता है कि अगर परिवार में पहले से कोई वकील या इस फील्ड में नहीं है तो बहुत मुश्किल है..! देख लो..! क्या वजह है कि देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वकीलों का “शादी के बाजार में” कोई मोल नहीं है। मैनें पाया है कि अनेक जोशीले युवा विधि स्नातक अधिवक्ता बनने के बाद कुछ ही बरस में अपना “जोश-ओ-खरोश” खो बैठे और तृतीय श्रेणी की राजकीय नौकरी की तैयारी में लग गए और उसे पाकर अब “खुद को सुकून में” बताते हैं। दोस्तों मैं ये पाता हूं कि हमारा समाज प्रति माह एक “बंधी-बंधाई” तनख्वाह की मानसिकता रखता है, जो एक नौकरी में तो संभव है मगर वकालत कोई नौकरी तो है नहीं, नौकरी और व्यवसाय के बीच के इस फर्क को क्यों नहीं समझा जा रहा है। क्या वजह है कि आज नई पीढ़ी के युवा देश के नामी गिरामी विश्वविद्यालयों से एलएलबी करने के बाद प्रायः कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरी को ही प्रथम तरज़ीह दे रहे हैं, वकालत को नहीं। क्या वजह है कि समाज में वकालत का अच्छा खासा अनुभव रखने वाले से किसी वकील से कहीं ज्यादा कद्र/सम्मान बाईस तेईस बरस के किसी प्रथम श्रेणी राजकीय सेवा प्रतियोगी परीक्षा में चयनित प्रत्याशी को दिया जाता है। क्या वजह है किसी वकील को “सरकारी हो जाने” का मशविरा उसके शुभचिंतक “बतौर अच्छी सलाह” अक्सर देते हैं। मुझे लगता है कि आज के अर्थ प्रधान युग में अगर इस व्यवसाय में समय अनुरूप बदलाव नहीं किये गए तो युवा प्रतिभाओं का इस और आना और भी मुश्किल हो जायेगा। समय चिंतन का है, सुना है आज अधिवक्ता दिवस जो है।

मजरूह’ क़ाफ़िले की  मेरे दास्तां है ये
रहबर ने मिल के लूट लिया राहज़न के साथ
(रहबर :a guide, a conductor;
राहज़न: a robber;)

-:राजेश के. भारद्वाज, एडवोकेट
राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर
पत्रकारिता एंव जनसंचार स्नातक, संस्थापक संपादक “वोटर”

Published by

Rajesh K Bhardwaj

advocate Rajasthan High Court / Supreme Court. Founder editor newspaper named Voter. interested in system revolution. Savambu writer, poet....

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