आज मैंने चांद को देखा

आज मैंने चांद को देखा
कुछ मिनट रूक कर
कुछ ठहर कर..
अदभुत सा अनुभव..
कुछ पलों का..

मगर वो समेटे है अपने में
सदियों का सफर..
ना जाने कितने जमाने देखे..
अच्छे बुरे क्या क्या नहीं देखे..
मगर फिर भी आज भी..
है बिल्कुल सरल निश्चल!
मुस्कुराता हुआ..
शीतलता बरसाता हुआ..

अदभुत है ..
कुदरत का ये नजारा..
आज मैंने चांद को देखा
कुछ मिनट रूक कर
कुछ ठहर कर..

जाओ आप भी
चांद को देख आओ..
जैसा आज है..
अदभुत है..
कुदरत का ये नजारा..

सो लेना
कुछ पल ठहर कर..
कल उसे ना पाओगे
आज सा..

मगर है ये युगों से ही ऐसा
बिल्कुल आज सा..!!

हैप्पी शरद पूर्णिमा !

: राजेश

रावण कौन : राक्षस या ब्राहमण ?

आज मैंने फेसबुक पर किसी सज्जन का ये मासूम सा विद “मेलिस मिक्स” सवाल पढा कि बडी कन्फ्यूज़न है, रावण राक्षस है या ब्राहमण ? अगर ब्राहमण है तो उसे जलाते क्यों है? अगर राक्षस है तो उसकी जाति ब्राहमण कैसे है? क्या ब्राहमण ही राक्षस है या राक्षस ही ब्राहमण है?

मित्रों हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहां विभिन्न प्रकार के धर्म, पंथ तथा सम्प्रदाय हैं और सब लोग साथ साथ रहते हैं मगर अफसोस यह है कि विभिन्न धार्मिक त्यौहारों पर अवकाश का मजा तो उठा लेते हैं मगर अपने धर्म तक के बारे में अनभिज्ञ रहते हैं। सोशल मीडिया ने ये मौका दिया है कि हम अपने धार्मिक ज्ञान को भी बढायें तथा सभी धर्मों का सम्मान करें ना कि अपने अल्प ज्ञान की वजह से किसी का मजाक बनायें या खिल्ली उडायें।

मित्रों, अगर जिज्ञासा निश्चल और मासूम यानि इनोसेंट न होकर कपट पूर्ण हो तो ज्ञान की बजाए वैर ही बढाती है। उक्त ​फेसबुकिया सवाल के मंतव्य में जाना उतना महत्वपूर्ण नहीं है ,यधपि ये प्री डिटर्माइंड विद मेलिस प्रतीत होती है। अगर जरुरी हुआ तो इस सवाल का ही विश्लेषण भी हम करेंगे। मगर फ़िलहाल मैं फिर भी ये उचित समझता हूं कि इस सवाल /जिज्ञासा के विषय पर कुछ पॉजिटिव चर्चा की जाये।

बहरहाल, दशहरा अभी गया है और दीवाली आने वाली है अत: रावण का चरित्र अध्ययन बहुत प्रासंगिक भी है। और इस बहाने हम मित्रों के ज्ञान में कुछ जुडेगा ही। मगर कुतर्क करने वालों और किसी मंतव्य विशेष और निहितार्थ लिखने पूछने वालों के ​लिए कोई सूचना और जानकारी किसी काम की नहीं होती है क्यों कि ऐसे लोग जानकारी नहीं ​बल्कि वैर बढानें में अधिक रूचि रखते हैं। हरि ओम।

ग्रंथों में वर्णन है कि देवता और दानव आपस में सौतेले भाई हैं और निरंतर झगडते आ रहे हैं। महर्षि कश्यप की पत्नी अदिति से देवों और दिति से दानवों का जन्म हुआ। दिति की गलत शिक्षा और अदिति के पुत्रों से अपने संतान को आगे बनाने की होड में दानव गलत दिशा में चले गये और देवताओं के कट्टर शत्रु बन गये।

रावण के विषय में बहुत सारे ग्रंथ और व्यापक सामग्री उपलब्ध है मगर मैं यहां सिर्फ एक संदर्भ का ही जिक्र कर रहा हूं जो निम्न है :—

समुद्र मंथन से अमृत प्राप्ति के बाद वर्षों तक देवताओं का पलडा भारी रहा और वो दानवों पर भारी पड गये। इस बीच देवताओं ने पुन: तपबल से शक्ति अर्जित की तब दानव परेशान हो गये और उन्होंने अपने गुरु से पूछा कि, गुरुवर हम कैसे देवताओं को हरा सकते है तब उनके गुरु ने कहा देवता अमृत पान कर चुके हैं उन्हें हराना बहुत कठिन है, और एक ही उपाय है अगर श्रेष्ठ ब्राह्मण का तेजस्वी पुत्र आपको सहायता करे तो देवताओं को हराया जा सकता है।

उपाय जान कर दानवों ने सोचा ब्राह्मण पुत्र भला हमारा काम क्युँ करेगा, उसके लिये हमारा साथ देना उसका अधर्म होगा और इस कार्य के लिये कोई भी तेजस्वी तो क्या पृथ्वी लोक का साधारण ब्राह्मण भी तैयार नहीं होगा. अगर हम बलपूर्वक कुछ करंगे तो श्रेष्ठ और तेजस्वी ब्राह्मण हमारा ही विनाश कर डालेगा और कमजोर ब्राह्मण के पास हम गये तो, देवता भी हँसी करंगे और हमारी कीर्ति को भी धब्बा लगेगा।

मंथन और चिंतन के दौर शुरु हुए दानवों के और वे सब एक निर्णय पर पहुँचे कि अगर हम अपनी कन्या का दान किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दें तो, ब्राह्मण को अवश्य स्वीकार करना ही पडेगा क्युँकि ब्राह्मण श्रेष्ठ मर्यादा का पालन करने को बाध्य है उसका पुत्र होगा, वो हमारा भांजा होगा और ब्राह्मण भी, उसे हम पालंगे शिक्षा दीक्षा देंगे, हमारे अनुसार चलेगा और जब मर्जी देवताओं से भिडा देंगे।

तब एक दानव बोला कन्या दान वाली बात ठीक है पर दान कैसे दोगे? ये रीति तो हम दानवों की है नहीं, ब्राह्मण कन्यादान कैसे और क्यों स्वीकार करेगा। देवताओं वाले रिवाज हम कर नहीं सकते, क्युँकि वो हमारे अनुकुल नहीं रहे हैं। अन्य दानवों ने कहा बात तो सही है और निर्णय को सोच समझ कर के लेने के लिये मीटींग को दूसरे दिन तक के लिये टाल दिया।

रात को एक दानव अपने घर में बहुत परेशान और उधेडबुन में था कि इस बात का हल कैसे दिया जाए। वो अपने परिवार में बैठा था उसकी पत्नी और पुत्री ने चिंता का कारण पूछा, तब उसने उनको बात बतलाई। उसकी पुत्री का नाम था केशिनी उसने कहा पिता जी दानव कन्या का विवाह श्रेष्ठ ब्राह्मण के साथ इसकी आप चिंता ना करें, मैं श्रेष्ठ ब्राह्मण विश्रवा को जानती हूँ जो आर्यावृत प्रदेश के पास के जंगल में ही अपने शिष्यों के साथ आश्रम में रहते हैं। वे अपने शिष्यों को बहुत सयंम और शांति के साथ अध्ययन कराते हैं, मैंने उनको देखा है उनका ज्ञान भी बहुत श्रेष्ठ है, ऐसा मुझे लगता है क्युँकि मैं कई बार छुप छुप के उनको सुन चुकी हूँ। अगर पिताजी आपकी आज्ञा हो तो मैं उनके पास जाऊँगी और उनसे प्रार्थना करूँगी कि वो मुझे अपनी पत्नी के रुप में स्वीकार करें। मुझे पूर्ण विश्वास है वे मुझे अवश्य अपनाएंगे, मैं उनके स्वभाव से परिचित हूँ।

पुत्री केशिनी की बात सुन, उसके माता पिता बहुत प्रसन्न हुए, पिता ने अपनी पुत्री को कहा कि पुत्री तु इस दानव कुल की रक्षा और भलाई के लिये सोचा, तु भाग्यशाली और धन्य है, कल मैं सभी से इस बारे में चर्चा करुंगा और तब तुम्हें अपना निर्णय दुँगा। दूसरे दिन केशिनी के पिता ने अन्य सभी दानवों को अपनी पुत्री केशिनी द्वारा दिया गया सुझाव बतलाया और सभी बहुत खुश हुए केशिनी को आज्ञा दे दी गई. केशिनी अपने कार्य में सफल रही। शक्तिशाली दानव की पुत्री होने के बाद भी उसने नम्रता पूर्वक अपने माता पिता की चिंता दूर करने का प्रयास किया और ब्रह्मा जी के मानस पुत्र, महर्षि पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा ने उन्हें अपनी पत्नी के रुप में आश्रम में स्वीकार कर लिया।

एक अच्छी पत्नी के रुप में केशिनी अपने पति की कई वर्षों तक बहुत सेवा की और एक दिन उसके पति ऋषी विश्रवा ने प्रसन्न हो कर केशिनी से वर माँगने को कहा. केशिनी ने अद्भुत और तेजस्वी पुत्रों की माँ होने का वरदान माँगा, जो देवताओं को भी पराजित करने की ताकत रखता हो। केशिनी ने एक पुत्री, पत्नी और माँ के रुप मे अपनी मर्यादा का पालन करने में पूर्णरुप से सफल रही। अपने माता पिता की चिंता को दूर ही नहीं किया अपितु उसके बाद पति सेवा का तप भी किया समय आने पर उसने एक अद्भुत बालक को जन्म दिया जो दस सिर और बीस हाथों वाला अत्यंत तेजस्वी और बहुत सुंदर बालक था।

केशिनी ने ऋषि से पूछा यह तो इतने हाथ और सर लेके पैदा हुआ है ऋषि ने कहा कि तुमने अद्भुत पुत्र की माँग की थी इसलिये अद्भुत अर्थात इस जैसा कोई और न हो, ठीक वैसा ही पुत्र हुआ है। उसके पिता ने ग्यारहवें दिन अद्भुत बालक का नामकर्ण संस्कार किया और नाम दिया रावण। रावण अपने पिता के आश्रम में बडा हुआ और बाद में उसके दो भाई कुम्भकर्ण तथा विभीषण और एक अत्यंत रुपवती बहन सूर्पनखा हुई।

आशा है कि फेसबुकिया प्रश्न की क्षुधा कुछ शांत हुई होगी, हां अगर वो निर्मल और निर्दोष है तो! और जो कि वो लगता तो नहीं है..!

हरि ॐ !

राजेश के भारद्वाज
पत्रकारिता एंव जनसंचार स्नातक,
संस्थापक संपादक “वोटर”,
एडवोकेट, राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर