युवा मित्रों आई0 ए0 एस0 बनना मगर लाट साब नहीं !

युवा मित्रों आई0 ए0 एस0 बनना मगर लाट साब नहीं !

भारतीय सिविल सेवा में चयनित सभी युवाओं को बधाई ! इनमें से कुछ फेसबुक फ्रेंड्स भी हैं। सोशल मीडिया पर कुछ मित्र इनकी गणना अपनी अपनी जाति व धर्म के आधार पर भी कर रहे हैं जो उनका व्यक्तिगत मामला है।

मैंने अभीतक ये गणना नहीं की है कि मेरी जाति के कितने युवा इसमें सफल घोषित हुए हैं क्योंकि मेरे विचार में इससे कुछ भी फर्क नहीं पडता क्यों कि इन सबकी जाति अब आई0ए0एस0 हो चुकी है!

मगर प्रसंगवश आज मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि सिविल सेवा के परिणाम प्रतिवर्ष आते हैं। सफल युवाओं के बडे बडे आदर्श बातों से लबरेज साक्षात्कार भी छपते हैं जिनमें वो ईमानदारी, जनसेवा व पीडितों को त्वरित न्याय की बडी बडी बातें करते हैं फिर ट्रेनिंग पर चले जाते हैं ततपश्चात पोस्टिंग, मोटी तनख्वाह , अथाह सुख सुविधाएं व गाडीयां-बंगले, नौकर चाकर पाते हैं और कुछ अपवादों को छोडकर, बडे साहब बनकर सुखसुविधाओं से लैस स्ट्रोंग ए0सी0 वाले बंद कमरेनुमा आफिस में “लाट साहब” बनकर बैठ जाते हैं और दरवाजे पर चौकीदार व सशस्त्र गार्ड्स बैठा दिए जाते हैं।

तब ये नौनिहाल ब्रिटिशकालीन औपनिवेशिक कानूनों के लकीर के फकीर बनकर कार्य करने लगते हैं। लालफीताशाही, बाबूगिरी, पर्ची से मिलना, केवल और केवल मिटींगों में व्यस्त रहना आदि आदि बातों और शब्दों से आमजन का सामना होने लगता है।

गरीब की तो बात छोडो अपितु साधारण आमजन व किसानों तथा पीडितों का इनसे मिलना व अपनी समस्या कहना तक असंभव सा हो जाता है। हाल ही का श्रीगंगानगर कलक्टर व किसानों का वाकया आप मित्रों को याद ही होगा। हाईकोर्ट तक को तल्ख टिप्पणीयां करने पर मजबूर हो जाना पडता है व कहना पडता है कि आई0ए0एस0 बने हो राजा नहीं। सरकारों को कहना पडता है कि गांवों में जाकर आमजन के साथ रहो। मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात!

एक वकील होने के नाते अपने मुवक्किलों बाबत मुझे अक्सर सरकारी कार्यालयों में भी जाना पडता है तब मैं स्वंय देखता हूं कि देश में कहने को तो लोकतंत्र है मगर शासक और शासित में बहुत अधिक दूरी व बहुत अधिक परायापन निहित है व शासकों के नाजो अंदाज़ से बिलकुल नहीं लगता कि हम किसी गरीब देश में हैं।

मैं अपने आप से पूछता हूं कि ऐसा क्यों होता है कि कुछ अपवादों को छोडकर, अधिकांशत: जो युवा बेहद सामान्य से परिवारों से यहां आए होते हैं वो भी नजाकत, नफासत और किसी खानदानी वीआईपी सिंडोम से ग्रसित से नजर आने लगते हैं।

दोस्तों कहीं ये उस टेनिंग के कारण तो नहीं जो हमारे इन प्रतिभाशाली युवाओं को चयन के बाद दी जाती है? या फिर वजह कुछ और ही है या ब्रिटिश साम्राज्य की मजबूत निशानी के तौर पर इस अखिल भारतीय सेवा की सरंचना ही कुछ इस प्रकार की है ? ऐसा क्यो है दोस्तों ?

मेरा ये सब लिखने का निहितार्थ सिर्फ इतना सा ही है कि अगर ब्रिटिश कोलोनियल माइंड सैट पर आधारित व्यवस्थागत खामी की वजह से हम हमारे प्रतिभाशाली युवाओं को खो रहे हैं और उनकी प्रतिभा का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं तो हमें इसे बदलना ही होगा व इसके अन्य विकल्प तलाशने होंगे।

लेखक:

राजेश कुमार भारद्वाज
पत्रकारिता एंव जनसंचार स्नातक
संस्थापक संपादक, “वोटर”
एडवोकेट राज. हाईकोर्ट जोधपुर