तो क्या आरक्षण समाप्त ही हो जायेगा… ?

1990 के दशक और उससे पूर्व देश में आरक्षण हटाओ के आंदोलन हुआ करते थे तब तक मंडल आयोग वाला आरक्षण लागू नहीं हुआ था। आज जो भी जातियां पिछडी जाति के आधार पर आरक्षण ले रही है वे सब उस समय अनारक्षित थी। सो उस समय आरक्षण के विरोध में आज की अधिकांश मजबूत समझी जाने वाली शामिल थी।

मगर समय के साथ वातावरण बदलता गया। आरक्षण का विरोध करने वाली जातियां यहां तक कि सवर्ण जातियां भी अपने लिए आरक्षण की मांग करने लगी। ऐसा क्यों हुआ ? इसका उतर एक साबुन के विज्ञापन में है जिसमें कहा जाता है कि मेरी कमीज से उसकी कमीज अधिक उजली क्यों ?

चतुर, देश व समाज भंजक राजनेताओं ने जब किसी एक प्रभावशाली जाति को आरक्षण दे दिया तो दूसरी प्रभावशाली जाति में यह होड शुरू हो गई कि उसे आरक्षण तो हमें क्यों नहीं? जब वे पिछडे तो हम अगडे कैसे ? बस यही मुददा अब शेष रह गया है जिसकी वजह से आरक्षण की आग देश में फैलती ही जा रही है। और इस प्रकार प्रभावशाली व शक्तिशाली जातियों का शक्तिप्रदर्शन आज खुद सरकारों और नेताओं के पीछे भस्मासुर बन कर दौडने लगा है। कई अन्य शक्तिशाली जातियां आदि चुपचाप सारा परिदृश्य देख कर अपनी आगामी रणनीति भी बना रहे हैं।

शास्त्रों में कहा गया है कि अति सर्वत्र वर्जयेत!आज आरक्षण केवल और केवल एक राजनैतिक मुददा है जिसका तर्क वितर्क की बजाए केवल वोटों से संबध है। मेरे विचार मैं आरक्षण की इस बढती आग में आरक्षण की इस वर्तमान अवधारणा के होम होने का समय निकट आता जा रहा है।

राजेश कुमार भारद्वाज
पत्रकारिता एंव जनसंचार स्नातक,
एडवोकेट,
राजस्थान उच्च न्यायालय जोधपुर
संस्थापक संपादक : वोटर