स्व0 वैद्य श्री रामकुमार जी शर्मा (महियांवाली, श्री गंगानगर)

 

ः स्मृतियां शेषः          :स्वर्गवास दिनांक 17 मई 2013:

मेरे जज्बाती दिल की कुछ बातें जो मैं आपसे शेयर कर रहा हूं:

जो शायद आपको रूचिकर लगे: ः मेरे ननिहाल की कुछ कोमल स्मृतियां:

बरसों पहले का ग्राम मंहियांवाली के घर की सुबह की चाय का वो मंजर याद आता है जब विशाल संयुक्त परिवार के सभी छोटे बडे एक साथ चोके के चारों ओर साथ बैठकर चाय की कटोरियों में आटे के बने बिस्किट या रात की रोटियों को डुबाडुबाकर खाते व हंसी ठहाकों के साथ बीते कल की बातों को लेकर बच्चे आपस में हंसीठिठोली करते। कोई सदस्य इस बैठक को देरी से उनींदा सा जोइन करता तो उसी की कोई चर्चा बडे प्यार के साथ चल पडती। चाय की प्यालियां जी भरके पी जातीं, बच्चों को बडे प्यार के साथ सिर्फ दूध पीने को दिया जाता। घर की दर्जनों गायों का ताजा दूध.. मानो अमृत… (आज के शहरी जीवन में ज्यादा अहसास होता है ) नाना जी इस बैठक में कुछ देरी से आते और किनारों वाली थाली भरकर दूध पीते.. इतना कि, हम बच्चे भी प्रेरित होकर उनकी नकल करने के असफल प्रयास करते।

किसी के मन में कोई वैर विरोध नहीं, कोई अहम नहीं, कोई दिखावा या बनावटीपन नही,ं सिर्फ स्नेह अपनापन और निर्मलता। नाना – नानी जी की प्यार भरी नसीहतें और उनका आपसी विनोदी वार्तालाप। सच, कितना आदर्श पारीवारिक माहौल था वो आज के टी.वी. सीरियलों और सामान्य जनजीवन से ठीक उलट।

दोपहर में, गर्मी की छुटिटयों में एकत्र हुए हम दर्जनों बच्चों की शरारतों का वो दौर… लक्ष्मी मामा के साथ पडौसीयों की कच्ची छतों पर भागना या फिर उन छतों पर रखे मिटटी के मटकों व बर्तनों को उनके आंगन में फेंककर भाग जाना। फिर आने वाले उलाहनों पर बहानबाजियां तैयार करना… पडौसी भी अपनेपन से लबरेज इतने कि हमारी शैतानियों को यह   समझकर सहते कि ये बच्चे साल में एक बार ही तो आते हैं। फिर नहर पर नहाने चले जाना और तेज तपती बालू में लोटलोट कर वो फिर बार बार नहर में गोते लगाना… फिर घर में चोरांे की तरह प्रवेश…. नाना जी की वो नसीहतों भरी डांट… फिर नाना जी का हाथ पैर दबाने के आदेश का डर…जिसमें वो लेटकर आराम करते हुए एक साथ कई बच्चों को अपने सवा छ फुटे बलिष्ठ शरीर पर खडा कर देते थे। नानी जी दोपहर में जब ठंडाई बनाती तो हम सब बच्चे उन्हें घेर कर खडे हो जाते। जिसका सबमें समान वितरण किया जाता।

नाना जी का गंगानगर से रोज रात को हम बच्चों के लिए गुलकंद वाला पान लाना, जिनका हम बच्चों में बंटवारा अगली सुबह विमला मौसी जी या फिर नानी जी करतीं। नाना जी का बच्चों को रोज गुल्लक के रूप में सिक्के देना। दोपहर में साइकिल पर (आजकल त्याज्य समझी जानेवाली) रंगीन आइसक्रीम वाले की आवाज सुनकर हम बच्चों का यूं दौडना जैसे कि कोई फरिश्ता ही आ गया हो और जमकर वो रंगीन आइसक्रीम खाना चाहे गला खराब हो जाए तो किसे फिकर..।  जोधराज डांस, पोटाश, डिंडे का खेल…लक्ष्मी मामा का वो सिर पर मेट लगाकर पूरे घर में भागना और हम बच्चों का पीछे पीछे पूरे घर में दौडना…

वो रातों को नानी से कहानियां सुनने के बाद घर के खुले आंगन व खुली छतों पर चारपाईयां बिछाकर सोना और गर्म हवाओं में भी ए.सी. या कूलर की कोई तलब ना होना बरबस ही याद आता है और अब लगता है कि समय बदल गया है।

औषधालय में नाना जी द्वारा एकसाथ जुटे हुए दर्जनों मरीजों के साथ हंसी मजाक व सत्यनारायण के उच्चारण के साथ औषधियों का वितरण..। उनकी वो अपनापन व आत्मीयता से लबरेज मुस्कुराहट एक अलग ही प्रभाव व छाप छोडती थी। गरीब मरीजों को निशुल्क दवा के साथ बस किराया व आर्थिक सहायता देने के दृश्य मुझे आज भी स्पष्ट याद हैं। सरलता, सादगी और सेवा को नाना जी ने अपने जीवन के क्षण क्षण में समाहित कर रखा था। कर्म ही उनकी पूजा थी, पूजा पाठ के नाम पर औपचारिकतों के वशीभूत होते हुए मैंने कभी उन्हें नहीं देखा, हां, फुर्सत के पलों में गीता प्रेस की किताबें व परम श्रद्धेय स्वामी रामसुखदास जी महाराज की किताबें पढते मैंनें उन्हें देखा था।

उनका राजदूत मोटर साइकिल को खेतों के पानी के घाटों में से तीसरे गेयर में चलाते हुए पैरों से जोर लगाकर निकालना (बजाए छोटा गेयर लगाये ).. दोपहर में सबसे आखिर में खाना खाना जिसमें कांसे की थाली में करारी मिसी रोटी, छाछ और लहसुन की चटनी आवश्यक रूप से होती और जो नानी जी के स्वंय उन्हें अपने हाथों से परोसतीं और कुछ घर परिवार की बातें भी वे तब करतीं जिसमें हम बच्चों की कुछ शिकायतें भी शुमार होतीं। नाना जी को मैंने कभी भी क्रोध में नहीं देखा, वे नानी जी की बातें सुनकर खाना खाते खाते मन ही मन बस मुस्कुराते रहते, तब नानी जी उनसे कुछ हल्की सी नाराजगी प्रकट करती। खाने में उन्हें एक समय खाना व सूखे मेवे तथा बीकानेरी भुजिया, रसगुल्ले पसंद थे।

एक बार मैं जब गंभीर चिकनपाक्स से ग्रसित हुआ तो वे खबर मिलते ही औषधियां लेकर बीकानेर आए और मुझे बातों और इलाज के जरिये बेहद साहस प्रदान किया जो मैं भूलाए नहीं भूल सकता, तब मैंने मरीजों के लिए उनकी अहमियत को स्वंय महसूस किया था और विनम्रता पूर्वक कहा था कि “नाना जी अब आप जल्दी वापस जाओ आपके मरीजों को आपकी मेरी जितनी ही जरूरत है वहां…“

नाना जी का अपने छोटे भ्राता परम आदरणीय नाना जी स्व0 वैद्य श्री शिवप्रकाश जी गौड के साथ अनन्य प्रेम और अकेले बैठे हुए भी उन्हें “भियो“ कहकर याद करते रहना बरबस ही याद आता है। परम आदरणीय  नानी जी के स्वर्गवास के बाद वे उन्हें भी बहुत याद करते रहते थे। बात बात में उनकी कही बातों का जिक्र किया करते। एक सफल, समर्पित  जीवन जीकर वे 88 वर्ष की आयु में भरा पूरा परिवार छोडकर परलोक गमन कर गये। उनकी  जीवन स्मृतियां सभी के लिए प्रेरणादायक है।

दिनांक 18.5.13 को जब मैं जोधपुर से मंहियांवाली पहंुचा और आंगन में रखे परम पूज्य श्री नाना जी की पार्थिव देह पर रखे कपडे को उठाकर जब उनके दमकते चेहरे को देखा तो मुझे पल भर में ये कई सारी बातें स्मरण हो आईं और मेरी आंखों में बरबस ही आंसू उतर आए।

उस पल भर में लगा कि जैसे कोई एक पूरा युग बीत गया हो, जो अब लौटकर कभी नहीं आएगा। मुझे लगता है कि किसी भी व्यक्ति के लिए, चाहे वो कोई भी हो ननिहाल की अपनी कोमल स्मृतियां होती हैं और उसके सबसे आकर्षक शब्द होते हैं नाना, नानी और मामा…।

23.5.2013, 11 पी.एम.                                          राजेश

मत लो निरीह मूक पशुओं की हाय!

वैशाख के इस माह में छोटी काशी कहे जाने वाले बीकानेर में पिछले कई दिनों से “अचानक“ आवारा पशुओं को शहर से बाहर निकालने का अभियान चला हुआ है। जो उतना ही तुगलकी है जैसे कि इस मौसम में कोई वृक्षारोपण का अभियान चलाए। ये पशु अचानक कोई आसमान से तो उतरे नहीं तो फिर यह अभियान अचानक अभी क्यों ? लगभग 45 डिग्री के इस तपते मौसम में इन निरीह मूक प्राणीयों को चारा पानी से वंचित करके, शहर से बाहर बंजर और सूखी धरती पर छोडना किसी भी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता क्यों कि ये तो इन मूक प्राणीयों को काल के गाल में जानबूझकर समाने के समकक्ष ही होगा। सबंधित प्राधिकारीयों को चाहिए कि वे मूक प्राणीयों की पीडा को समझे व इस अभियान को बारिश के मौसम के बाद चलाए जबकि इन पशुओं को शहर से बाहर खाने को चारा पानी उपलब्ध हो सके वरना ये पशु तडप तडप कर मर जाने को मजबूर हो जायेंगे तथा उनकी हाय जिम्मेदारों को लील जाएगी।