नरेंद्र मोदी का भाषण

आज शाम इंडिया टुडे के समारोह में नरेंद्र मोदी ने जो भाषण दिया उसे सुनकर लगा कि एक ऐसा व्यक्ति बोल रहा है जो आजाद है… और कुछ मौलिक करने की चाह रखता है वरना तो अक्सर भाषण होते हैं कि फलानी जी, धिकडे जी, वो जी,……..जी, जी…..ओर लो भाषण खत्म। नो मौलिकता ओनली चाटुकारिता……….घोर गुलामी और दासता …

नरेंद्र मोदी के भाषण की सात मौलिक बातेंः-

1. रेलवे की पटरी पर नीजि रेले क्यों ना चलें?

2. रेलवे को रेल डिब्बे बनाने की क्या जरूरत है? क्यों ना नीजि क्षेत्र यह काम करे ?

3. पूरी पाक बार्डर पर बी.एस.एफ. सौर उर्जा क्यों ना बनाएं?

4. कुछ बनने के बजाए कुछ करने का सपना क्यों ना देखा जाए?

5. गुजरात के अफसरों को मंच पर यह कहने का अवसर देता हूं कि आपने अब तक सबसे अच्छा क्या किया तथा मैं पीछे बैठकर सुनता हूं।

6. गुजरात में ट्रांसफर उद्योग बिल्कुल बंद।

7. शहरों के 50 किमी. के दायरे में किसानों को सब्जियां लगाने की व्यवस्था जो शुद्ध पानी व जैविक खाद पर आधारित हो।

पुलिस वकील और वो….

परसों रात को टी.वी. पर हिंदी में डब की हुई एक दक्षिण भारतीय फिल्म देख रहा था जिसमें एक आई.पी.एस. आफिसर कह रहा था कि नेता हमसे गुलामी कराते हैं अपने लिए घंटो रास्ते रूकवाते हैं जो हमें भी बुरा लगता है, लेकिन हम आदेश की पालना को मजबूर होते हैं ओर जनता हमसे नाराज होती है। यानि पुलिस को वो करना होता है जो सतासीन नेता कराते हैं और फिर जनता ये सोचती है कि पुलिस गलत है, जबकि नेता गलत होता है जिसके मन में वस्तुतः आजन्म सताधीश व निरकुंश शासक होने की भावना ठीक अंग्रेजी शासकों जैसी होती है। अच्छे ओर बुरे लोग सब जगह होते हैं चाहे वो कोई वर्ग हो तबका हो पेशा हो । भारत का दुर्भाग्य यह है कि यहां जिसे भी सता मिली उसने हमेशा पुलिस का दुरूपयोग किया। पुलिस सुधार तो दूर, उसकी बात भी कभी नहीं की व पुलिस के चरित्र को सदैव खौफनाक बनाए रखने में ही अपना स्वार्थ देखा। पुलिस की व्यवस्था व संरचना आज भी अंगे्रजों के बनाए कानून से संचालित है जिसका एकमात्र ध्येय ही निरीह भारतीयों को पीडित व प्रताडित करना था।

सता का चरित्र कभी नहीं बदलता चाहे वो किसी भी दल की सरकार हो। भारत की आजादी के बाद से अब तक विभिन्न केंद्र व राज्य सरकारों ने पुलिस का दुरूपयोग ही किया है। अंग्रजों के जमाने से भारतीयों को किसी न किसी बहाने से या हिसंक होने का आरोप लगाकर, जानवरों की तरह हमेशा पीटा गया है जिसका ताजा उदाहरण बाबा रामदेव के शिविर में लाठीचार्ज, केजरीवाल व अन्ना के आंदोलन व बिहार की नीतिश सरकार में पुलिस की लाठी के बेजा इस्तेमाल है। बाबा रामदेव के शिविर में लाठीचार्ज की निंदा सर्वत्र हुई, सुप्रीम कोर्ट ने उसे गलत माना लेकिन केंद्र सरकार ने अपयश का सारा ठिकरा पुलिस के माथे पर फोडा था। जयपुर व चंडीगढ में वकीलों को बर्बरतापूर्वक पुलिस द्वारा पीटवाया गया। पुलिस के नाम पर सरकारों ने अब तक जो डंडाराज चला रखा है वर्तमान व्यवस्था में उसका प्रभावी विरोध वकीलों के अलावा कोई दूसरा वर्ग कर ही नहीं सकता, क्यों कि स्वार्थी सरकारें अन्य वर्गों जैसे किसानों, व्यापारियों, सरपंचो, डाक्टरों, छात्रों आदि को पुलिस से पीटाने के बाद कई अन्य झूठे आरोप लगाकर मुकदमों में फंसा देती है ओर फिर उनका कोई सहारा नहीं होता सिवाए बेबसी के या किसी वकील के।

वकीलों की एकता की शक्ति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हाल के वर्षों में हमारे पडौसी देश में सैनिक सता से टकरा कर वहां के सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की रक्षा व पुनः पदप्रतिष्ठा वहां के वकीलों ने अकेले अपने बूते ही कर दिखाई थी। विभिन्न कारणों से अन्य वर्गों की मजबूरी हो सकती है कि वे कुटिल सरकारों द्वारा कराए गये पुलिसिया अत्याचार से डर जाये या चुप बैठ जाए या पुलिस का समर्थन करने लगे लेकिन वकीलों का एकजुट तबका अनेक विशेषाधिकारों से सुसज्जित है तथा पुलिस की आड में, सरकारी डंडाशाही से लोकतंत्र व स्वंय पुलिस के हित में उसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। अगर सरकारों के पुलिस के दुरूपयोग पर वकील कोई रोक लगा पाये तो यह लोकतंत्र व पुलिस के हित में होगा तब जनता पुलिस को अपना सच्चा मित्र मान सकेगी व जुर्म के विरूद्ध थानों में जाने से डरेगी नहीं। पुलिस कभी भी अपने राजनैतिक आकाओं के आदेश के बिना डंडा लाठी तो क्या, हाथ भी नहीं उठा सकती। तो हर बार ये लाठीयां कौन भांजता है ? क्या पुलिस या सतारूढ नेता ? जानकार जानते हैं कि देश भले ही आत्मनिर्भर हो गया हो पुलिस आज भी बंधी हुई है।

देश सेवा का जज्बा लेकर मेरिटोरियस छात्र प्रतियोगी परीक्षा में सफल हो कर आई.पी.एस. और आर.पी.एस. थानेदार व सिपाही बनते हैं और अंततः कुंठित होकर त्यागपत्र देते हैं या अपने आदर्शों को त्यागने पर मजबूर हो जाते हैं जिसका प्रमाण कई बार यथार्थ में व फिल्मों में भी देखने को मिलता है। पुलिस में जाने के जज्बे की पवित्रता उस बच्चे से समझी जा सकती है जो बडा होकर पुलिस बनने की बात आंखों में चमक के साथ कहता है। यह आज किसी से छिपा हुआ नहींे है कि थानों व जिलों की बोली व ठेका कौन लगाता है…। पुलिस के सिपाही व अधिकारीयों की चैबीसों घंटों की डयूटी क्यों है? क्यों थानों में साधनो व संसाधनों की कमी है ? क्यों सिपाहीयों को जनता की बजाए नेताओं की व्यक्तिगत हाजिरी में लगाया जाता है? क्यों प्रोटोकाल के नाम पर पूरा थाना सतारूढ नेता जी के पीछे पीछे लल्लोचप्पो में लगाया जाता है जबकि उस समय अपराधी बैखौफ हो रहे होते हैं। पुलिस को सतारूढ नेता जी के किन किन प्रकार के दबाबों में कार्य करना पडता है, इसका अंदाजा आम जन को हो नहीं सकता। क्योंकि सता से बाहर होते ही पुलिस का दुरूपयोग करने वाला वही नेता उसी पुलिस को कोसने लगता है व उसे कू्रर छवि प्रदान कराता है।

पुलिस में अनेक राष्ट्रभगत हैं जो स्वंय नेताओं के बुरे कारनामों से दुखी हैं लेकिन कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है। किसी वकील के जज बनने पर उसकी सुरक्षा में पुलिस कर्मीयों को ही तो नियुक्त किया जाता है। संकट में, दुघर्टना में हम पुलिस को मदद के लिए पुकारते हैं। ये अलग बात है कि वो अपनी इस पंगु स्थिति में हमारी कितनी मदद कर पाती है। लेकिन सवाल ये है कि पुलिस की इस स्थिति के लिए जिम्मेदार नेताओं की बजाए अनपढ व भोली जनता सिर्फ पुलिस को ही दोष देती है। क्योंकि दुर्भाग्यवश देश के नेताओं ने पुलिस को रावण की छवि प्रदान की है। वकील तबका तो बौद्धिक वर्ग है तथा सक्षम और हर सुधार को करने की क्षमता रखता है। आज जरूरत इस बात की है कि बांटो और राज करो कि नीति वाले चतुर काले अंग्रेजों की चाल को पूरे देश का वकील समुदाय व पुलिस तथा सच्चे राजनेता शांति से समझे, और समस्या के मूल को पकडे और तहकीकात इस बात की हो बकौल शायर, कि सवाल ये नहीं है कि शीशा बचा या फिर टूट गया …सवाल ये है कि पत्थर कहां से आया..?