जो हुआ अच्छा ही हुआ!आओ “नए” का स्वागत करें!

जो इतिहास में कभी नहीं हुआ क्या वो कभी नहीं होना चाहिए? अगर आपका उत्तर हां है तो आज तक जो भी नए अविष्कार हुए हैं वे कभी नहीं होते! क्या किसी अंधेरे कौने पर टॉर्च की रोशनी महज़ इस डर से नहीं डाली जानी चाहिए कि वहां गंदगी के दर्शन होने की संभावना है? “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” तो संविधानप्रदत्त मूल अधिकार है, जो किसी भी नियम/उपनियम से ऊपर है, इसमें कोई दोराय नहीं हो सकती।

इतिहास गवाह है कि जब भी कुछ नया या अप्रतिम हुआ है तो रूढ़िवादियों ने उसकी मुख़ालफ़त ही की है, हाहाकार ही किया है मगर अफ़सोस कि उससे वो होने वाला “नया” कभी रुका नहीं है। यथास्थितिवादी लोग कभी नहीं चाहते कि जिस व्यवस्था से वे आज तक सुविधा में हैं उसमें लेशमात्र भी बदलाव की कोई बात भी करे।

सिर्फ “इज्जत न कम हो जाये” के डर से ही बुराइयों को हमेशा हमेशा के लिए लाल कालीन के नीचे छुपाकर “सब अच्छा है” के मुग़ालते में तो नहीं रहा जा सकता है। किसी रोगी से उसका रोग उसकी मृत्यु पर्यन्त छुपाये रखने से रोग पर पार तो नहीं पाया जा सकता।

मैं व्यक्तिगत रूप से गैर परंपरावादी रहा हूं और मेरा विनम्र मत है कि समय, स्थान और आवश्यकता के अनुसार बदलाव शाश्वत रूप से जरुरी होता है नई तकनीक को अपनाने में कोई हर्ज नहीं..बंद कमरे में सड़ांध से बचने के लिए ही तो खिड़कियां, दरवाजे और रोशनदान बनाये जाते हैं। फिर झूठा दंभ, अभिमान और तानाशाही तो रावण की भी नहीं टिकी बाकि की तो बिसात ही क्या? महान वचन है कि, “जो हुआ अच्छा हुआ और आगे भी अच्छा ही होगा।”

नोट:- मैं अपने इन विचारों को किसी घटना विशेष का सन्दर्भ जानबूझकर नहीं दे रहा हूं ताकि पाठकों के समझने का दायरा संकुचित न हो जाये और वे इसका सन्दर्भ अपने अपने हिसाब से लगा सकें।

:राजेश के. भारद्वाज
पत्रकारिता एंव जनसंचार स्नातक, संस्थापक संपादक “वोटर”, एडवोकेट, राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर
(13.1.18)

वकील की पहचान के लिए
एक काला कोट ही काफी है!
न कोई छोटा न बड़ा
एक नाम वकील ही काफी है!
फिर भी गर कोई न पहचाने तो
वकील एकता जिंदाबाद
का एक पैगाम ही काफी है!
किसी छोटे मोटे हुक्मरान के
पद मद की तो बात ही क्या दोस्तों!
ब्रिटिश हुकूमत के हुए हश्र की
एक दास्तान ही काफी है!
वकील की पहचान के लिए
एक काला कोट ही काफी है!
:- राजेश के. भारद्वाज

वकील क्या वाकई “ऑफ़िसर ऑफ़ द कोर्ट” है?

भारत की वर्तमान न्याय व्यवस्था में आज न्यायालय चाहे वो सुप्रीम कोर्ट हो, हाईकोर्ट हो या फिर कोई अधीनस्थ न्यायालय, जज और वकील किसी भी न्यायालय के अभिन्न अंग हैं, और एक दूसरे के अधीनस्थ नहीं होते हुए भी परस्पर आपसी सम्मान और गरिमा को बनाये रखते हुए अपना कार्य करते हैं। एक लंबे उत्कृष्ट कार्य अनुभव के बाद किसी “एडवोकेट” को “सीनियर एडवोकेट”, सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट चीफ़ जस्टिस के द्वारा बतौर सम्मान बनाया जाता है। सीनियर एडवोकेट को ये विशेषाधिकार प्राप्त होता है कि वो किसी भी केस में बिना अपना वकालतनामा पेश किये न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखे। मेरे ख्याल से अभी राजस्थान में कुल जमा 20-25 ऐसे सीनियर एडवोकेट्स होंगे। मैंने अपने अनुभव में ये पाया है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में किसी सीनियर एडवोकेट को चीफ़ जस्टिस समेत सभी अन्य जजेज़ बहुत अधिक सम्मान प्रदान करते हैं। मैंने कई सीनियर एडवोकेटस/एडवोकेट्स को अपनी प्रतिभा के बूते हाईकोर्ट और सीधे ही सुप्रीम कोर्ट के जज और देश के पद पर आसीन होते हुए भी देखा है। विद्वान चाहे वो वकील हो या कोई और सम्मान का हर हाल में हक़दार होता है।

लेकिन मैंने कल शाम की जोधपुर अधीनस्थ न्यायालय परिसर की एक घटना के वीडियो में राजस्थान पुलिस के एक अधिकारी को राजस्थान हाईकोर्ट के एक सीनियर एडवोकेट (जो लगभग 80 वर्ष के हैं और कई बार राजस्थान बार काउंसिल के सदस्य और अध्यक्ष भी रह चुके हैं) को बांह मरोड़ कर धक्का देकर हड़काते हुए देखा तो कई सारे सवाल जेहन में एक के बाद एक आने लगे।

लेकिन तुरंत अपनी प्रतिक्रिया देने की बजाय मैंने इस घटना पर आज के समाचार पत्रों में छपे न्यूज़ आइटम अपनी फेस बुक वाल पर डाल कर जनमन की थाह लेना अधिक उचित समझा। अभी तक जो प्रतिक्रियाएं आई उनमें एक तो ये आई कि यौन शोषण के आरोपी आसाराम की पेशी पर इतनी महिलाएं आती ही क्यों है? दूसरे कुछ मित्रों ने हाईकोर्ट के आसाराम के केस के ही सिलसिले में ही पारित एक आदेश का हवाला दिया जिसमें पुलिस प्रशासन को धारा 144 की शक्तियों का इस्तेमाल अनावश्यक भीड़ के निवारण बाबत करने का निर्देश है। विद्वान मित्रों ने ये भी लिखा कि सीनियर एडवोकेट साहब ने पुलिस अधिकारी महोदय का ईगो उनके मातहतों के समक्ष “हर्ट” कर दिया।

उक्त प्रतिक्रियाओं/पक्षों का मैं सम्मान करता हूं लेकिन इस बाबत कोई प्रतिक्रिया नहीं आई कि इस वीडियो में ये बुजर्ग सीनियर एडवोकेट ये बेसिक क़ानूनी सवाल ही तो उठा रहे थे कि पुलिस के हाथ में लाठी होने का मतलब क्या ये है कि उसे अपरिमित शक्तियां हासिल हो जाती है? क्या पुलिस द्वारा अपनी शक्ति के दुरुपयोग के विरुद्ध न्यायिक या अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं हो सकती है? इसी दौरान उन्होंने महिलाओं पर पुरुष पुलिसकर्मी द्वारा हाथ उठाने का ही तो विरोध किया (जो कोई भी हो सकता है) और पूछने पर अपना पूरा परिचय भी दिया। तीन-तीन सितारों को अपने कंधों पर लेकर चलनेवाले किसी पुलिस अधिकारी के किसी कृत्य को अविधिपूर्ण लगने पर उसे उसी समय टोकने का साहस इस देश में एक एडवोकेट के अलावा क्या कोई अन्य कर सकता है? ऐसे में अगर किसी एडवोकेट या किसी भी अन्य नागरिक का धक्का और अपमान मिलेगा तो इससे हित किसका होगा?

ऐसे में सवाल ये उठता है कि अगर उस समय उस जगह इन सीनियर एडवोकेट की जगह पर पुलिस का ही कोई उच्च अधिकारी, आईपीएस या कोई आईएएस या कोई जज ही संयोगवश होता और जिस प्रकार इस सीनियर एडवोकेट ने अपना परिचय दिया उसी प्रकार अपना परिचय देता तो भी क्या पुलिस अधिकारी का बांह मरोड़ कर धक्का देने का ऐसा ही बर्ताव होता?? मेरा तो यह मानना है कि अगर विद्वानों और बुजुर्गों का सम्मान भी हम बरक़रार नहीं रख सकते हैं तो फिर हम कर ही क्या सकते हैं।

इतिहास गवाह है कि इस देश में वकीलों ने हमेशा दूसरों पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद की है। क्या यह सही नहीं है कि अविधिपूर्ण होने की वजह से पुलिस के किये गए अन्वेषण हाईकोर्ट के द्वारा अपास्त हो जाते हैं। क्या यह सही नहीं है कि अनेकों बार जिस एफआईआर में पुलिस चालान तक पेश करने की तैयारी पूर्ण कर लेती है वे एफआईआर ही हाईकोर्ट द्वारा अपास्त हो जाती है, इस प्रकार के निर्णय विद्वान एडवोकेट्स के तर्कों और क़ानूनी बहस के आधार पर ही तो न्यायालय करते हैं। कानून को लागू करवाने का अधिकार पुलिस के अलावा वकीलों को भी हासिल है तभी तो सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों को “ऑफ़िसर ऑफ़ द कोर्ट” की पदवी से नवाज़ा है।

इस देश में सभी नागरिकों को सम्मान और गरिमा के साथ जीने का अधिकार सुनिश्चित होना चाहिए। पुलिस अगर आईपीएस, आईएएस, जज और मंत्रियों का सम्मान करने को बाध्य है तो उसे आम नागरिक और वकीलों “ऑफ़िसर ऑफ़ द कोर्ट” का सम्मान भी करना होगा। नहीं तो प्रश्न ये बचेगा कि वकील क्या वाकई “ऑफ़िसर ऑफ़ द कोर्ट” है?

:राजेश के. भारद्वाज
पत्रकारिता एंव जनसंचार स्नातक, संस्थापक संपादक “वोटर”, एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट/राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर
(07.1.18)

अधिवक्ता दिवस पर मेरे मुझसे कुछ सवाल!

हाइकोर्ट्स, सुप्रीम कोर्ट के टॉप क्लास के पांच सात प्रतिशत अधिवक्ताओं को बतौर अपवाद छोड़ दें तो एक व्यवसाय के रूप में वक़ालत का व्यवसाय आज एक अजीब से मोड़ पर खड़ा प्रतीत होता है, जिसके विषय में शायद कोई सोच भी नहीं रहा है और किसी को परवाह भी नहीं है। मित्रो! क्या वजह है कि जब किसी गांव-कस्बे का कोई नया विधि स्नातक पहली बार काला कोट पहनकर किसी न्यायालय की देहरी पर कदम रखता है तो ऐसा न करने के लिए वह “समझदारों” द्वारा कई बार टोका और सचेत किया जा चुका होता है, उससे कहा जा चुका होता है कि अगर परिवार में पहले से कोई वकील या इस फील्ड में नहीं है तो बहुत मुश्किल है..! देख लो..! क्या वजह है कि देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वकीलों का “शादी के बाजार में” कोई मोल नहीं है। मैनें पाया है कि अनेक जोशीले युवा विधि स्नातक अधिवक्ता बनने के बाद कुछ ही बरस में अपना “जोश-ओ-खरोश” खो बैठे और तृतीय श्रेणी की राजकीय नौकरी की तैयारी में लग गए और उसे पाकर अब “खुद को सुकून में” बताते हैं। दोस्तों मैं ये पाता हूं कि हमारा समाज प्रति माह एक “बंधी-बंधाई” तनख्वाह की मानसिकता रखता है, जो एक नौकरी में तो संभव है मगर वकालत कोई नौकरी तो है नहीं, नौकरी और व्यवसाय के बीच के इस फर्क को क्यों नहीं समझा जा रहा है। क्या वजह है कि आज नई पीढ़ी के युवा देश के नामी गिरामी विश्वविद्यालयों से एलएलबी करने के बाद प्रायः कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरी को ही प्रथम तरज़ीह दे रहे हैं, वकालत को नहीं। क्या वजह है कि समाज में वकालत का अच्छा खासा अनुभव रखने वाले से किसी वकील से कहीं ज्यादा कद्र/सम्मान बाईस तेईस बरस के किसी प्रथम श्रेणी राजकीय सेवा प्रतियोगी परीक्षा में चयनित प्रत्याशी को दिया जाता है। क्या वजह है किसी वकील को “सरकारी हो जाने” का मशविरा उसके शुभचिंतक “बतौर अच्छी सलाह” अक्सर देते हैं। मुझे लगता है कि आज के अर्थ प्रधान युग में अगर इस व्यवसाय में समय अनुरूप बदलाव नहीं किये गए तो युवा प्रतिभाओं का इस और आना और भी मुश्किल हो जायेगा। समय चिंतन का है, सुना है आज अधिवक्ता दिवस जो है।

मजरूह’ क़ाफ़िले की  मेरे दास्तां है ये
रहबर ने मिल के लूट लिया राहज़न के साथ
(रहबर :a guide, a conductor;
राहज़न: a robber;)

-:राजेश के. भारद्वाज, एडवोकेट
राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर
पत्रकारिता एंव जनसंचार स्नातक, संस्थापक संपादक “वोटर”

न्यायपालिका जिंदाबाद!

न्यायपालिका जिंदाबाद!

इसी एक सप्ताह में एक के बाद एक तीन दिन देश की न्यायपालिका के तीन ऐसे फैसले आए जो पूरे देश के समाचार माध्यमों की सुर्खियां बन गए। ये हैं तीन तलाक, निजता का अधिकार और आज बाबा गुरमीत। ऐसा लगता है कि इस देश में व्यवस्थापिका और कार्यपाालिका की अकर्मण्यता का बोझ भी न्यायपालिका के कंधों पर आ गया है। न्यायपालिका जिसे सबसे कम साधन और संसाधन दिये गये हैं वो बावजूद अपनी सारी कमीयों और खामियों के देश के संविधान की गरिमा को बरकरार रखने का अपना दायित्व निभा रही है। अगर देश में पर्याप्त न्यायिक सुधार हो जाएं तो क्या खूबसूरत समां हो! न्यायपालिका का गठन मुख्यत: जजों और वकीलों से होता है तथा वर्तमान में सेशन और उससे उच्च स्तर के सौ प्रतिशत जज वस्तुत: वकील ही है जिनकी सनद निलंबित है। ऐसे में यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि आज भी देश की सेवा में वकीलों का रोल कितना महत्वपूर्ण है।:— राजेश के. भारद्वाज, पत्रकारिता व जनसंचार स्नातक, संस्थापक संपादक वोटर, एडवोकेट राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर

मेरे मन की बात !

मैं प्रायः “मन की बात” जो रेडियो पर भारत के प्रधानमंत्री का देश की जनता को एक संबोधन होता है उसे “विशेषतौर” पर नही सुनता हूं जिसकी कोई खास वजह भी नही है मगर आज संयोगवश कानों में पड़ने पर मैंनें एफएम पर इसे सुनना जारी रखा।

प्रधानमंत्री जी युवाओं से उनकी छुट्टियों के सदुपयोग की बात कर रहे थे..गर्मियों में पक्षियों के लिए पानी की बात कर रहे थे..खाने की बर्बादी कैसे रुके इसकी बात कर रहे थे..लाल बत्ती जो गाड़ियों से तो उतर गई मगर कइयों के दिमागों में रह गई उसकी बात कर रहे थे..मुझे लगा कि मेरी जानकारी में आजतक किसी प्रधानमंत्री ने इस प्रकार से बेलाग जनसंवाद नही किया और हां, इन बातों में बनावटीपन और कोई औपचारिकता नही थी।

मुझे लगता है कि इतिहास में जन संवाद के अधिकतम प्रयास वर्तमान प्रधानमंत्री महोदय ने किए हैं जो कि आमजन से उनका “कनेक्ट” बना रहे हैं और शायद उन्हें मिल रहे रिकार्ड समर्थन की एक मूल वजह भी है। विरोधी दलों को इस बात को समझने की जरूरत है..और केवल विरोध के लिए ही विरोध करने से काम चलने वाला है नहीं!

: राजेश कुमार, एडवोकेट
पत्रकारिता एंव जनसंचार स्नातक,
संस्थापक संपादक ” वोटर”

हां, मुझे तुमसे प्यार है..

हां, मुझे तुमसे प्यार है..
अनूठी है तुम्हारी सनातन संस्कृति,
कितनी प्यारी है यहां की भाषाएं,
और कहां है इतने मौसम इतने त्यौहार?
मुझे प्यार है तुम्हारी प्राकृतिक संपदाओं से,
ओतप्रोत हो तुम अपनेपन और प्यार से..
हां मेरे प्यारे भारत, मुझे तुमसे प्यार है!

:- कुमार राजेश

आज मैंने चांद को देखा

आज मैंने चांद को देखा
कुछ मिनट रूक कर
कुछ ठहर कर..
अदभुत सा अनुभव..
कुछ पलों का..

मगर वो समेटे है अपने में
सदियों का सफर..
ना जाने कितने जमाने देखे..
अच्छे बुरे क्या क्या नहीं देखे..
मगर फिर भी आज भी..
है बिल्कुल सरल निश्चल!
मुस्कुराता हुआ..
शीतलता बरसाता हुआ..

अदभुत है ..
कुदरत का ये नजारा..
आज मैंने चांद को देखा
कुछ मिनट रूक कर
कुछ ठहर कर..

जाओ आप भी
चांद को देख आओ..
जैसा आज है..
अदभुत है..
कुदरत का ये नजारा..

सो लेना
कुछ पल ठहर कर..
कल उसे ना पाओगे
आज सा..

मगर है ये युगों से ही ऐसा
बिल्कुल आज सा..!!

हैप्पी शरद पूर्णिमा !

: राजेश

रावण कौन : राक्षस या ब्राहमण ?

आज मैंने फेसबुक पर किसी सज्जन का ये मासूम सा विद “मेलिस मिक्स” सवाल पढा कि बडी कन्फ्यूज़न है, रावण राक्षस है या ब्राहमण ? अगर ब्राहमण है तो उसे जलाते क्यों है? अगर राक्षस है तो उसकी जाति ब्राहमण कैसे है? क्या ब्राहमण ही राक्षस है या राक्षस ही ब्राहमण है?

मित्रों हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहां विभिन्न प्रकार के धर्म, पंथ तथा सम्प्रदाय हैं और सब लोग साथ साथ रहते हैं मगर अफसोस यह है कि विभिन्न धार्मिक त्यौहारों पर अवकाश का मजा तो उठा लेते हैं मगर अपने धर्म तक के बारे में अनभिज्ञ रहते हैं। सोशल मीडिया ने ये मौका दिया है कि हम अपने धार्मिक ज्ञान को भी बढायें तथा सभी धर्मों का सम्मान करें ना कि अपने अल्प ज्ञान की वजह से किसी का मजाक बनायें या खिल्ली उडायें।

मित्रों, अगर जिज्ञासा निश्चल और मासूम यानि इनोसेंट न होकर कपट पूर्ण हो तो ज्ञान की बजाए वैर ही बढाती है। उक्त ​फेसबुकिया सवाल के मंतव्य में जाना उतना महत्वपूर्ण नहीं है ,यधपि ये प्री डिटर्माइंड विद मेलिस प्रतीत होती है। अगर जरुरी हुआ तो इस सवाल का ही विश्लेषण भी हम करेंगे। मगर फ़िलहाल मैं फिर भी ये उचित समझता हूं कि इस सवाल /जिज्ञासा के विषय पर कुछ पॉजिटिव चर्चा की जाये।

बहरहाल, दशहरा अभी गया है और दीवाली आने वाली है अत: रावण का चरित्र अध्ययन बहुत प्रासंगिक भी है। और इस बहाने हम मित्रों के ज्ञान में कुछ जुडेगा ही। मगर कुतर्क करने वालों और किसी मंतव्य विशेष और निहितार्थ लिखने पूछने वालों के ​लिए कोई सूचना और जानकारी किसी काम की नहीं होती है क्यों कि ऐसे लोग जानकारी नहीं ​बल्कि वैर बढानें में अधिक रूचि रखते हैं। हरि ओम।

ग्रंथों में वर्णन है कि देवता और दानव आपस में सौतेले भाई हैं और निरंतर झगडते आ रहे हैं। महर्षि कश्यप की पत्नी अदिति से देवों और दिति से दानवों का जन्म हुआ। दिति की गलत शिक्षा और अदिति के पुत्रों से अपने संतान को आगे बनाने की होड में दानव गलत दिशा में चले गये और देवताओं के कट्टर शत्रु बन गये।

रावण के विषय में बहुत सारे ग्रंथ और व्यापक सामग्री उपलब्ध है मगर मैं यहां सिर्फ एक संदर्भ का ही जिक्र कर रहा हूं जो निम्न है :—

समुद्र मंथन से अमृत प्राप्ति के बाद वर्षों तक देवताओं का पलडा भारी रहा और वो दानवों पर भारी पड गये। इस बीच देवताओं ने पुन: तपबल से शक्ति अर्जित की तब दानव परेशान हो गये और उन्होंने अपने गुरु से पूछा कि, गुरुवर हम कैसे देवताओं को हरा सकते है तब उनके गुरु ने कहा देवता अमृत पान कर चुके हैं उन्हें हराना बहुत कठिन है, और एक ही उपाय है अगर श्रेष्ठ ब्राह्मण का तेजस्वी पुत्र आपको सहायता करे तो देवताओं को हराया जा सकता है।

उपाय जान कर दानवों ने सोचा ब्राह्मण पुत्र भला हमारा काम क्युँ करेगा, उसके लिये हमारा साथ देना उसका अधर्म होगा और इस कार्य के लिये कोई भी तेजस्वी तो क्या पृथ्वी लोक का साधारण ब्राह्मण भी तैयार नहीं होगा. अगर हम बलपूर्वक कुछ करंगे तो श्रेष्ठ और तेजस्वी ब्राह्मण हमारा ही विनाश कर डालेगा और कमजोर ब्राह्मण के पास हम गये तो, देवता भी हँसी करंगे और हमारी कीर्ति को भी धब्बा लगेगा।

मंथन और चिंतन के दौर शुरु हुए दानवों के और वे सब एक निर्णय पर पहुँचे कि अगर हम अपनी कन्या का दान किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दें तो, ब्राह्मण को अवश्य स्वीकार करना ही पडेगा क्युँकि ब्राह्मण श्रेष्ठ मर्यादा का पालन करने को बाध्य है उसका पुत्र होगा, वो हमारा भांजा होगा और ब्राह्मण भी, उसे हम पालंगे शिक्षा दीक्षा देंगे, हमारे अनुसार चलेगा और जब मर्जी देवताओं से भिडा देंगे।

तब एक दानव बोला कन्या दान वाली बात ठीक है पर दान कैसे दोगे? ये रीति तो हम दानवों की है नहीं, ब्राह्मण कन्यादान कैसे और क्यों स्वीकार करेगा। देवताओं वाले रिवाज हम कर नहीं सकते, क्युँकि वो हमारे अनुकुल नहीं रहे हैं। अन्य दानवों ने कहा बात तो सही है और निर्णय को सोच समझ कर के लेने के लिये मीटींग को दूसरे दिन तक के लिये टाल दिया।

रात को एक दानव अपने घर में बहुत परेशान और उधेडबुन में था कि इस बात का हल कैसे दिया जाए। वो अपने परिवार में बैठा था उसकी पत्नी और पुत्री ने चिंता का कारण पूछा, तब उसने उनको बात बतलाई। उसकी पुत्री का नाम था केशिनी उसने कहा पिता जी दानव कन्या का विवाह श्रेष्ठ ब्राह्मण के साथ इसकी आप चिंता ना करें, मैं श्रेष्ठ ब्राह्मण विश्रवा को जानती हूँ जो आर्यावृत प्रदेश के पास के जंगल में ही अपने शिष्यों के साथ आश्रम में रहते हैं। वे अपने शिष्यों को बहुत सयंम और शांति के साथ अध्ययन कराते हैं, मैंने उनको देखा है उनका ज्ञान भी बहुत श्रेष्ठ है, ऐसा मुझे लगता है क्युँकि मैं कई बार छुप छुप के उनको सुन चुकी हूँ। अगर पिताजी आपकी आज्ञा हो तो मैं उनके पास जाऊँगी और उनसे प्रार्थना करूँगी कि वो मुझे अपनी पत्नी के रुप में स्वीकार करें। मुझे पूर्ण विश्वास है वे मुझे अवश्य अपनाएंगे, मैं उनके स्वभाव से परिचित हूँ।

पुत्री केशिनी की बात सुन, उसके माता पिता बहुत प्रसन्न हुए, पिता ने अपनी पुत्री को कहा कि पुत्री तु इस दानव कुल की रक्षा और भलाई के लिये सोचा, तु भाग्यशाली और धन्य है, कल मैं सभी से इस बारे में चर्चा करुंगा और तब तुम्हें अपना निर्णय दुँगा। दूसरे दिन केशिनी के पिता ने अन्य सभी दानवों को अपनी पुत्री केशिनी द्वारा दिया गया सुझाव बतलाया और सभी बहुत खुश हुए केशिनी को आज्ञा दे दी गई. केशिनी अपने कार्य में सफल रही। शक्तिशाली दानव की पुत्री होने के बाद भी उसने नम्रता पूर्वक अपने माता पिता की चिंता दूर करने का प्रयास किया और ब्रह्मा जी के मानस पुत्र, महर्षि पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा ने उन्हें अपनी पत्नी के रुप में आश्रम में स्वीकार कर लिया।

एक अच्छी पत्नी के रुप में केशिनी अपने पति की कई वर्षों तक बहुत सेवा की और एक दिन उसके पति ऋषी विश्रवा ने प्रसन्न हो कर केशिनी से वर माँगने को कहा. केशिनी ने अद्भुत और तेजस्वी पुत्रों की माँ होने का वरदान माँगा, जो देवताओं को भी पराजित करने की ताकत रखता हो। केशिनी ने एक पुत्री, पत्नी और माँ के रुप मे अपनी मर्यादा का पालन करने में पूर्णरुप से सफल रही। अपने माता पिता की चिंता को दूर ही नहीं किया अपितु उसके बाद पति सेवा का तप भी किया समय आने पर उसने एक अद्भुत बालक को जन्म दिया जो दस सिर और बीस हाथों वाला अत्यंत तेजस्वी और बहुत सुंदर बालक था।

केशिनी ने ऋषि से पूछा यह तो इतने हाथ और सर लेके पैदा हुआ है ऋषि ने कहा कि तुमने अद्भुत पुत्र की माँग की थी इसलिये अद्भुत अर्थात इस जैसा कोई और न हो, ठीक वैसा ही पुत्र हुआ है। उसके पिता ने ग्यारहवें दिन अद्भुत बालक का नामकर्ण संस्कार किया और नाम दिया रावण। रावण अपने पिता के आश्रम में बडा हुआ और बाद में उसके दो भाई कुम्भकर्ण तथा विभीषण और एक अत्यंत रुपवती बहन सूर्पनखा हुई।

आशा है कि फेसबुकिया प्रश्न की क्षुधा कुछ शांत हुई होगी, हां अगर वो निर्मल और निर्दोष है तो! और जो कि वो लगता तो नहीं है..!

हरि ॐ !

राजेश के भारद्वाज
पत्रकारिता एंव जनसंचार स्नातक,
संस्थापक संपादक “वोटर”,
एडवोकेट, राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर

युवा मित्रों आई0 ए0 एस0 बनना मगर लाट साब नहीं !

युवा मित्रों आई0 ए0 एस0 बनना मगर लाट साब नहीं !

भारतीय सिविल सेवा में चयनित सभी युवाओं को बधाई ! इनमें से कुछ फेसबुक फ्रेंड्स भी हैं। सोशल मीडिया पर कुछ मित्र इनकी गणना अपनी अपनी जाति व धर्म के आधार पर भी कर रहे हैं जो उनका व्यक्तिगत मामला है।

मैंने अभीतक ये गणना नहीं की है कि मेरी जाति के कितने युवा इसमें सफल घोषित हुए हैं क्योंकि मेरे विचार में इससे कुछ भी फर्क नहीं पडता क्यों कि इन सबकी जाति अब आई0ए0एस0 हो चुकी है!

मगर प्रसंगवश आज मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि सिविल सेवा के परिणाम प्रतिवर्ष आते हैं। सफल युवाओं के बडे बडे आदर्श बातों से लबरेज साक्षात्कार भी छपते हैं जिनमें वो ईमानदारी, जनसेवा व पीडितों को त्वरित न्याय की बडी बडी बातें करते हैं फिर ट्रेनिंग पर चले जाते हैं ततपश्चात पोस्टिंग, मोटी तनख्वाह , अथाह सुख सुविधाएं व गाडीयां-बंगले, नौकर चाकर पाते हैं और कुछ अपवादों को छोडकर, बडे साहब बनकर सुखसुविधाओं से लैस स्ट्रोंग ए0सी0 वाले बंद कमरेनुमा आफिस में “लाट साहब” बनकर बैठ जाते हैं और दरवाजे पर चौकीदार व सशस्त्र गार्ड्स बैठा दिए जाते हैं।

तब ये नौनिहाल ब्रिटिशकालीन औपनिवेशिक कानूनों के लकीर के फकीर बनकर कार्य करने लगते हैं। लालफीताशाही, बाबूगिरी, पर्ची से मिलना, केवल और केवल मिटींगों में व्यस्त रहना आदि आदि बातों और शब्दों से आमजन का सामना होने लगता है।

गरीब की तो बात छोडो अपितु साधारण आमजन व किसानों तथा पीडितों का इनसे मिलना व अपनी समस्या कहना तक असंभव सा हो जाता है। हाल ही का श्रीगंगानगर कलक्टर व किसानों का वाकया आप मित्रों को याद ही होगा। हाईकोर्ट तक को तल्ख टिप्पणीयां करने पर मजबूर हो जाना पडता है व कहना पडता है कि आई0ए0एस0 बने हो राजा नहीं। सरकारों को कहना पडता है कि गांवों में जाकर आमजन के साथ रहो। मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात!

एक वकील होने के नाते अपने मुवक्किलों बाबत मुझे अक्सर सरकारी कार्यालयों में भी जाना पडता है तब मैं स्वंय देखता हूं कि देश में कहने को तो लोकतंत्र है मगर शासक और शासित में बहुत अधिक दूरी व बहुत अधिक परायापन निहित है व शासकों के नाजो अंदाज़ से बिलकुल नहीं लगता कि हम किसी गरीब देश में हैं।

मैं अपने आप से पूछता हूं कि ऐसा क्यों होता है कि कुछ अपवादों को छोडकर, अधिकांशत: जो युवा बेहद सामान्य से परिवारों से यहां आए होते हैं वो भी नजाकत, नफासत और किसी खानदानी वीआईपी सिंडोम से ग्रसित से नजर आने लगते हैं।

दोस्तों कहीं ये उस टेनिंग के कारण तो नहीं जो हमारे इन प्रतिभाशाली युवाओं को चयन के बाद दी जाती है? या फिर वजह कुछ और ही है या ब्रिटिश साम्राज्य की मजबूत निशानी के तौर पर इस अखिल भारतीय सेवा की सरंचना ही कुछ इस प्रकार की है ? ऐसा क्यो है दोस्तों ?

मेरा ये सब लिखने का निहितार्थ सिर्फ इतना सा ही है कि अगर ब्रिटिश कोलोनियल माइंड सैट पर आधारित व्यवस्थागत खामी की वजह से हम हमारे प्रतिभाशाली युवाओं को खो रहे हैं और उनकी प्रतिभा का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं तो हमें इसे बदलना ही होगा व इसके अन्य विकल्प तलाशने होंगे।

लेखक:

राजेश कुमार भारद्वाज
पत्रकारिता एंव जनसंचार स्नातक
संस्थापक संपादक, “वोटर”
एडवोकेट राज. हाईकोर्ट जोधपुर